सफलता नहीं, श्रम और सार्थकता की आवश्यकता है-संजीव कुमार

सफलता नहीं, श्रम और सार्थकता की आवश्यकता है-संजीव कुमार

रायपुर/छत्तीसगढ। भारत की धार्मिक आध्यात्मिक क्रांति के प्रणेता गौतमबुद्ध और महावीर ने तो एक अर्थ में सफलता के उच्च स्तर को स्पर्श करने के बावजूद जिंदगी की असली खोज श्रम और सार्थकता की प्राप्ति के लिए राजकाज त्याग कर जंगल तथा ग्रामीण क्षेत्रों का भ्रमण कर श्रम और सार्थकता के असली रहस्य को श्रेष्ठ समझा था। यदि केवल राजा बन राज पाठ करना ही सफलता का सर्वाधिक महत्वपूर्ण मापदंड मानते तो आज बहुजन हिताय,बहुजन सुखाय, तथा अहिंसा, अनेकांत, अपरिग्रह के महत्वपूर्ण तथा जीवन के लिए अमूल्य सिद्धांतों से वंचित रहना पड़ता। आज महावीर तथा बुद्ध के पूरे विश्व में करोड़ों अनुयाई हैं, और दोनों ने श्रम तथा सार्थकता को जीवन में अपनाने को ही महत्व दिया था। सफलता उनके लिए मिथ्या के बराबर ही थी।
गुरु नानक देव द्वारा प्रतिपादित सरबत दा भला, हो या महात्मा गांधी का सर्वोदय, ईसा मसीह की करुणा, मोहम्मद साहब, टैगोर का मानवतावाद या नेहरू का अंतर्राष्ट्रीय राष्ट्रवाद जीवन के श्रम तथा सार्थकता की खोज में बड़े महत्वपूर्ण उदाहरण है। व्यक्तिगत और पारिवारिक स्तर पर देखा जाए तो महज रोजगार की तलाश विवाह संतानोत्पत्ति, बच्चों का भरण पोषण तथा सेवानिवृत्ति ही जीवन नहीं है। इसमें सामुदायिक श्रम और सार्थकता का समावेश होना समीचीन हैं। हालांकि इस बात में कोई दो मत नहीं कि पारिवारिक उत्तरदायित्व का निर्वहन समाजिक मूलभूत आवश्यकता है, पर इसके साथ-साथ कुछ ऐसा सार्थक श्रम किया जाना चाहिए जो न केवल आत्मिक संतोष का अनुभव प्रदान करें, बल्कि सामाजिक हित में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दें, और समाज को दिशा देने वाली कोई परिणति समाज के सम्मुख प्रकट हो, जिससे समाज के लोगों का जीवन परिष्कृत हो, इसी संदर्भ में राजा राममोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, सर सैयद अहमद खान,दयानंद सरस्वती, विवेकानंद ने हमेशा सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध अभियान चलाकर जीवन में श्रम तथा सार्थकता का महत्व बढ़ाकर सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया था। आज के संदर्भ में देखा जाए तो सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर बनाए गए कानून तथा योजनाओं का लाभ समाज के वंचित वर्गों को सीमांत कृषकों को असंगठित क्षेत्र के मजदूरों तक समुचित रूप से नहीं पहुंच पा रहा है और हमारे समाज के संविधान तथा विधान की सार्थकता इसी में है कि यह अपने मूल आदर्शों समानता बंधुत्व समाजवाद को दृष्टिगत रखते हुए समाज के उत्थान के लिए एक सशक्त माध्यम बने। यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि जीवन की असली खोज श्रम सार्थकता की उपलब्धि न होती और तथाकथित सफलता के शिखर पर व्यक्ति बैठ जाता और शांत हो जाता, तो सफलता के शिखर पर बैठे बिलगेट, वारेन बुफेट जैसे लोग अपनी अकूत संपत्ति का बड़ा भाग सामाजिक उद्देश्य के लिए दान नहीं करते। सुंदरलाल बहुगुणा चिपको आंदोलन चलाकर जल तथा पर्यावरण संरक्षण की बात नहीं करते। कैलाश सत्यार्थी बचपन बचाओ आंदोलन के माध्यम से बाल संरक्षण के अधिकारों का झंडा बुलंद नहीं करते।
किसी की चार दिन की जिंदगी में कोई सौ काम करता है।
कोई सौ बरसों में कुछ नहीं कर पाता है।

विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण अनुसंधान के माध्यम से हमारे जीवन को बेहतर और सरल बनाने वाले वैज्ञानिक निश्चित तौर पर जीवन में शर्म से सार्थकता की खोज में निरंतर परिश्रम तथा प्रेरणा प्राप्त करते रहें हैं। थॉमस अल्वा एडिसन, आइंस्टीन,मैडम क्यूरी और राइट बंधुओं के श्रम और सार्थकता के प्रयास में ही सफलता का परचम फैलाया है, पर इन सबके पीछे उनकी असाध्य मेहनत और दिमागी सार्थकता ही मुख्य कारक बनकर उन्हें उत्प्रेरित करते रहे हैं ,पर दूसरी तरफ यह भी सत्य है कि जीवन में सार्थकता की खोज सफलता के अभाव में संभव नहीं है। क्योंकि श्रम और सार्थकता का महत्व तभी तक है। जब तक वह सफल न हो, परंतु सफलता ही मनुष्य की अंतिम परिणति नहीं होनी चाहिए अन्यथा जीवन में मानवीय मूल्यों का महत्व नगण्य में होने की संभावना बनी रहती है। अतः श्रम मेहनत और सार्थकता समेकित रूप से मिलकर एक बड़ी सफलता को जन्म देते हैं। श्रम तथा सार्थकता तभी प्राप्त होती है, जब सफलता का आधार प्राप्त हो जाए। पर मूलत सफल होना ही पर्याप्त नहीं है और जीवन की असली खोज निरंतर श्रम तथा सार्थकता है। केवल सफलता आपको अस्थाई तथा तत्कालिक ,मानसिक ,शारीरिक सुख प्रदान कर सकती है, पर चिर स्थाई तथा आत्मिक संतोष के लिए उसमें श्रम तथा सार्थकता का समावेश होना अत्यंत आवश्यक होता है। अगर वह समाज के लिए एक आदर्श तथा उपयोगी मार्गदर्शक बन सकता है।
दुष्यंत कुमार ने एकदम सटीक लिखा है-इस नदी की ठंडी धार में,हवा आती तो है,नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।इसलिए जीवन में केवल सफलता के पीछे न जाकर श्रम, मेहनत और सार्थकता अत्यंत आवश्यक पहलू हैं।

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