भाजपा या विधायक! कौन हुआ फेल?

भाजपा या विधायक! कौन हुआ फेल?

ब्लॉक प्रमुख दानपुर पर हुई हार ने खड़े किए कई सवाल
डिबाई/बुलन्दशहर।
जिले में ऐसा नहीं कि भाजपा ब्लॉक प्रमुख चुनाव में कोई अन्य सीट नहीं हारी है, लेकिन डिबाई विधानसभा क्षेत्र भाजपा का ऐसा गढ़ है ,जहां सपा का विधायक होने पर भी दानपुर ब्लॉक प्रमुख के पद पर भाजपा का ही जलवा कायम रहा है। परन्तु वर्ष 2021 में हुए दानपुर ब्लॉक प्रमुख चुनाव में हुए घमासान से भाजपा के नतृत्व एवं उसके प्रतिनिधियों की कार्यशैली ने भाजपा को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है। जिस तरह से वर्तमान विधायक अनिता राजपूत ने डिबाई विधानसभा की राजनीति के अहम पुरोधाओं को मात देकर अपनी करीबी मंजू सिंह को भाजपा का समर्थन प्राप्त कर लिया था। उससे विधायक डॉ0 अनिता राजपूत के बढ़ते हुए कद को लेकर चर्चाओं का बाजार बेहद हाई था। विश्लेषकों की मानें तो अलीगढ़, कासगंज, हाथरस एवं बुलन्दशहर जैसे जिलों की कई विधानसभा सीटों पर विशेष प्रभावी, प्रदेश भाजपा में विशेष कद रखने वाले, लोध समाज का कद्दावर नेता एवं एटा सांसद राजवीर सिंह उर्फ राजू भैया के करीबी आनन्द को पटखनी देना वर्तमान विधायक की एक बड़ी कामियाबी माना जा रहा था, लेकिन संगठन और शीर्ष नेतृत्व के सामने भाजपा की किरकिरी कराने वाली डॉ0 अनिता राजपूत अब खुद एक सवाल बन गयी हैं। आखिर क्या ये वजह है कि डॉ0 राजपूत का जितना अच्छा प्रभाव शीर्ष नेतृत्व का विश्वास जीतने में कामयाब होता है, उतना ही बुरा परिणाम भाजपा को डॉ0 अनिता राजपूत की बात मानने के लिए भुगतना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि अनिता राजपूत ने पहली बार भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को अपनी बातों एवं शैली से प्रभावित किया है। ज्ञात हो कि डॉ राजपूत की कनवेंसिंग पावर का भुगतान भाजपा इससे पहले भी दो बार कर चुकी है। पहला मौका था डिबाई नगर पालिका अध्यक्ष पद का चुनाव ,जिसमंे जि़ला स्तरीय एक दिग्गज नेत्री को भाजपा ने प्रत्याशी तो बनाया परन्तु अपने समाज के वोट के अलावा विधायक का जादू उस चुनाव में न चल सका। यानी विधानसभा चुनाव 2017 के बाद नगर पालिका अध्यक्ष चुनावांे के समय भाजपा में गुटबाज़ी पहली बार सामने आई थी। इसके बाद जिला पंचायत सदस्य चुनावों में भी भाजपा समर्थित प्रत्यशियों की सूची जारी कराने में अनिता राजपूत ने शीर्ष नेतृत्व को एक बार फिर विश्वास में ले लिया। जिसके बाद डिबाई विधानसभा क्षेत्र में लड़ने वाले अधिकांश जिला पंचायत सदस्यों की हार ने एक बार फिर भाजपा को सोचने का मौका दिया। एक बार फिर भाजपा की हार का कारण बनी गुटबाज़ी। लेकिन तीसरी बार फिर डॉ अनिता राजपूत ने मंजू सिंह को समर्थन दिलाने में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को विश्वास में तो ले लिया लेकिन बीडीसी सदस्यों का विश्वास हासिल करने में अनिता राजपूत फिर नाकामयाब रहीं। इस सब के बीच जो अहम सवाल उठता है वो ये कि विश्वास और हार का चक्र आखि़र कब टूटेगा? आखिर शीर्ष नेतृत्व और वर्तमान विधायक में से कौन अपने आप में मंथन करेगा। आखिर ये गड़बड़ कहाँ हो रही है? जिस सामाजिक समीकरण के दम पर अनिता राजपूत ने कांग्रेस जैसी पार्टी को छोड़ कर भाजपा का दामन थाम कर चंद दिनों में विधानसभा चुनाव 2017 में ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। क्या उसी जातीय समीकरण को साधने में अनिता राजपूत फेल साबित हो रही हैं? जिस जातीय समीकरण के आधार पर हिम्मत सिंह, राम सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व राज्यपाल कल्याण सिंह, राजवीर सिंह ने भाजपा का परचम डिबाई विधानसभा पर लहराया है। उसी विधानसभा सीट पर दो बार कॉंग्रेस का झण्डा भी लोध समाज की हितेश कुमारी एवं स्वामी नेमपाल ने फहराया है। उस सीट को तोहफे में पाने वाली लोधी राजपूत समाज से आने वाली अनिता राजपूत का अपना वोटबैंक आखिर कैसे खिसक रहा है? ये प्रश्न वर्तमान विधायक डॉ अनिता राजपूत को बेचैन करने वाला हो या न हो ,लेकिन इस सवाल का जवाब जिला, प्रदेश एवं 2022 के चुनावी चाणक्यों को सोचने पर मजबूर ज़रूर करेगा। देखना है कि क्या अनिता राजपूत वर्ष 2017 वाली अनिता राजपूत खुद को बनाने में कामयाब होती है या नही? अपने पुराने राजनैतिक गुरुओं की बातों का स्मरण करके क्या अनिता राजपूत 2017 वाली भूमिका में आ पाती है या नही? क्या भाजपा अपनी परम्परागत डिबाई सीट को बचा पाती है या नही?

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