भाजपा के हाथों भाजपा की हार, गुटबाज़ी की भेंट चढ़ी ब्लॉक प्रमुख सीट

भाजपा के हाथों भाजपा की हार, गुटबाज़ी की भेंट चढ़ी ब्लॉक प्रमुख सीट

विधायक का तिलिस्म टूटा, निर्दलीय उम्मीदवार ने दर्ज की जीत
दानपुर ब्लॉक प्रमुख पद पर बड़ा उलटफेर, मंजू सिंह को हराकर आनन्द हुए विजयी
डिबाई/बुलन्दशहर ।
पंचायत चुनाव के अंतिम पड़ाव, ब्लॉक प्रमुख पद पर हुए चुनाव में बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। जिसके चलते जिले की महत्वपूर्ण, दानपुर ब्लॉक प्रमुख सीट पर भाजपा समर्थित प्रत्याशी मंजू सिंह को हार का मुंह देखना पड़ा तो वहीं विगत समय से खुद को भाजपा का एक कार्यकर्ता बताने वाले आनन्द के सिर जीत का सेहरा सज गया।दानपुर ब्लॉक परिसर में शनिवार को हुए मतदान के परिपेक्ष्य में 92 बीडीसी ने मतदान किया। जिसके बाद दोपहर 3 बजे शुरू हुई मतगणना के परिणाम स्वरूप आरओ मोहम्मद कुरैशी ने निर्दलीय उम्मीदवार आनंद लोधी को 40 मतों से विजयी घोषित कर दिया।
आरओ दानपुर के अनुसार कुल डाले गए 92 मतों में से 2 मत निरस्त हुए। शेष मतों में भाजपा समर्थित प्रत्याशी मंजू सिंह को 25 जबकि निर्दलीय प्रत्याशी आनन्द को 65 मत प्राप्त हुए। ज्ञात हो कि भाजपा के एक सशक्त खेमे को पटखनी देकर मंजू सिंह ने इस चुनाव का सेमीफाइनल भाजपा समर्थन के रूप में लगभग जीत लिया था। परन्तु भाजपा समर्थन न मिलने पर भी आनंद ने अपनी हार न मानते हुए बतौर निर्दलीय उम्मीदवार अपना नामांकन किया था। भाजपा समर्थित प्रत्याशी के तौर पर मंजू सिंह द्वारा किये गए नामांकन में वर्तमान विधायक अनिता राजपूत का अंदाज़ अति आत्मविश्वास पूर्ण था ,क्योंकि जिन बड़े योद्धाओं को पटखनी देकर मंजू सिंह ने भाजपा का समर्थन प्राप्त किया था ,उसमें डॉ0 अनिता राजपूत की भूमिका जग जाहिर है।
सूत्रों के अनुसार डॉ0 अनिता राजपूत के लिए दानपुर सीट अत्यंत महत्वपूर्ण इसलिए भी मानी जा रही थी क्योंकि जहां एक ओर भाजपा की पूर्व ब्लॉक प्रमुख एवं वर्तमान विधायक की बेहद करीबी मंजू सिंह भाजपा से समर्थन मांग रही थी तो वही अलीगढ़ मण्डल, बुलन्दशहर की कई सीटों पर बेहद प्रभावी, लोधी राजपूत समाज का अहम चेहरा एवं भाजपा में प्रदेश स्तरीय कद रखने वाले एटा सांसद राजवीर सिंह उर्फ राजू भैया के करीबी आनंद ने भी भाजपा से समर्थन मांगा था। परन्तु अब इसे अनिता राजपूत का कुशल रणनीति मानें या शीर्ष नेतृत्व पर वर्तमान विधायक की पकड़ ,जिसके चलते तमाम दिग्गजों को पटखनी देते हुए अनिता राजपूत, मंजू सिंह को भाजपा का समर्थन दिलाने में कामियाब रही अर्थात दूसरे शब्दों में कहा जाए तो दोनों ही ओर भाजपा ही लड़ रही थी। लेकिन भाजपा समर्थित प्रत्याशी के हारने के बाद विश्लेषकों की नजर में इस हार को कही न कही विधायक के फेल्योर से जोड़ कर देखा जा रहा है। क्योंकि जब भाजपा से समर्थन पाना विधायक की जीत का परिचायक है तो प्रत्याशी की हार की जि़म्मेदारी भी स्थानीय विधायक की ही बनती है। अब ये सिर्फ मंथन का विषय है कि अपने विश्वसनीय को बतौर प्रत्याशी समर्थन दिलाने में कामयाब होने वाली डॉ0 अनिता राजपूत के चुनावी मैनेजमेंट में आखिर कहां कमी रह गयी, कहाँ चूक हो गयी ,जिसका परिणाम इतना अप्रत्याशित सामने आया। क्योंकि 40 वोट से हुई हार क्रॉस वोटिंग का परिणाम तो नहीं हो सकता। तो क्या डॉ0 अनिता राजपूत का जनाधार अनिता राजपूत से खिसक रहा है? या विधायक के साथ मुंॅह चमकाते कथित रणनीतिकार, वर्तमान विधायक की छत्रछाया में सिर्फ अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हैं? क्योंकि विगत लगभग 4.5 वर्षों में जिस तरह से डॉ0 अनिता राजपूत के पीछे खड़े कथित रणनीतिकारों ने अपना-अपना आर्थिक एवं राजनैतिक स्वार्थ सिद्ध किया है वो जग जाहिर है। अब देखना ये है कि वर्ष 2022 में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए डॉ0 राजपूत ऐसे कथित रणनीतिकारों की असलियत समझ कर खुद को परिपक्व बना पाती हैं या नही? क्या वर्तमान विधायक जमीनी हकीकत से खुद को रूबरू करा पाती हैं या नही? क्योंकि 2022 के इस सेमीफाइनल में भले ही विधायक को झटका अवश्य मिला हो। यदि डॉ0 अनिता राजपूत को 2022 के फाइनल में खुद को मुकाबले में रखना है तो डॉ0 राजपूत को जहां एक ओर भाजपा से टिकट पाने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ेगी तो वहीं चुनाव 2022 में जीत का ख्वाब पूरा करने के लिए अपने चुनावी रणनीतिकारों और चुनाव रणनीति को बदलना होगा। इसी बीच आनन्द ने अपनी जीत सुनिश्चित करने के बाद पत्रकारों को सम्बोधित करते हुए कहा कि मैं भाजपा का एक छोटा सा कार्यकर्ता था ,हूँ एवं सदैव रहूँगा। मुझे भाजपा का समर्थन न मिलना ये मेरा भाग्य था ,लेकिन जिन क्षेत्र पंचायत सदस्यों ने पहले दिन से मुझे चुनाव लड़ाया, ये जीत उन सबकी जीत है। इसी के साथ इस जीत का श्रेय आनन्द ने पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व राज्यपाल कल्याण सिंह एवं एटा सांसद राजू भैया के आशीर्वाद को बताया।

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