पुलिस एवं व्यापारी में चूहे-बिल्ली का खेल जारी

पुलिस एवं व्यापारी में चूहे-बिल्ली का खेल जारी

कपड़ा एवं रेडीमेड व्यापारी उड़ाते हैं पुलिस का मजाक
डिबाई/बुलन्दशहर।
कहावत तो ये है कि जनता त्रस्त अधिकारी मस्त, लेकिन आज के इस कोरोना काल ने इस कहावत को ही पलट कर रख दिया है। आज का परिदृश्य ये है कि पुलिस त्रस्त- व्यापारी मस्त है। आज इस कोरोना संकट में जिस तरह से मृत्यु दर बढ़ रही है वो सरकारों एवं अधिकारियों के लिए मुसीबत बनती जा रही है, जिसके चलते सूबे में योगी सरकार ने तमाम समीकरणों को ध्यान में रखते हुए सशर्त प्रदेश में आंशिक कर्फ्यू लागू कर दिया है, जिसमें पुलिस-प्रशासन का मानना है कि बिना किसी सख्ती के आम लोगों से निवेदन करके इस लॉकडाउन का अनुपालन कराया जाए। लेकिन डिबाई नगर के घण्टाघर से लेकर होली गेट तक बड़ा बाजार में रेडीमेड, कपड़ा, जूता, कॉस्मेटिक, इलेक्ट्रॉनिक, आदि के दुकानदारों ने मानांे कसम खा रखी है कि हम नही सुधरेंगे। जबकि ज्ञात हो कि इन्ही में से कुछ के परिवार के सदस्यों की कोरोना काल में ऑक्सीजन की कमी से न सिर्फ हालात तक नाजुक हो गये है ,बल्कि कुछ के बच्चों की तो मौत तक हो गयी हैं। लेकिन धन्य है वो व्यापारी जिनके लिए अगर जिंदगी से भी ज्यादा कीमती है तो वो है पैसा। जबकि सूत्रों की मानंे तो पंचायत चुनाव के दौरान बाहर से आये हुए वोटर्स के माध्यम से कोरोना संक्रमण ग्रामीणांचल में भी पैर पसार चुका है और आज जितना भी ग्राहक बाजार में आता है उसमें 95प्रतिशत ग्रामीणांचल से है। पुलिस एवं प्रशासन चीख-चीख कर निवेदन करके थक जाता है कि मेडिकल, दूध, सब्जी, किराना, खाद्य सामग्री, खाद एव बीज के अलावा बाकी सभी दुकानों के पूर्णतः बंद रखें, लेकिन मजाल है कि मीना बाजार से लेकर घण्टा घर, घण्टा घर से लेकर होली गेट तक के दुकानदार मान जाएं। दिन निकलते ही अपनी-अपनी दुकान के सामने चाबियां हाथों में लेकर शोभा बढ़ाते दिख जाने वाले ये दुकानदार सड़कों पर घूमते हुए ग्राहकों को पकड़ कर अपनी दुकानों के शटर खोलकर 8 से 10 ग्राहकों को अंदर घुसा के बाहर से उन ग्राहकों को चोरों की तरह बंद कर देते हैं। इतना ही नही कुछ के तो घर और दुकान एक ही हैं तो बिना शटर उठाये अपने घर में से घुसा कर व्यापार कर लेते हैं। वरना तो जिनकी दुकानों के आगे और पीछे दो गेट हैं ,उनका पीछे का गेट खुला रहता है और बे खौफ ग्राहकी होती है। लेकिन इस सब मे छकती है तो पुलिस। जैसे ही बाइक या पुलिसिया गाड़ी आती है तो दूर बैठा पहला दुकानदार कहते हुए भागना शुरू करता है कि भागो भागो भागो…..आ गए आ गए आ गए…. और बस सड़क पर घूमते हुए ये सम्मानित व्यापारी चूहों की तरह बिल रूपी गलियों में छिप जाते हैं और पुलिस हताश बिल्ली की तरह मुॅंह ताकते हुए आगे निकल जाती है। बस फिर क्या चूहे फिर से बिल के बाहर आ जाते है? इसी तरह ये चूहे-बिल्ली का खेल पूरे दिन चलता है और कोरोना के साथ-साथ पुलिस प्रशासन भी मजाक का पात्र बन जाता है। आखिर कोरोना कर्फ्यू के नाम पर ये मजाक कब तक चलेगा? और कब तक हम अपने आप को धोखा दे पाएंगे। ये यक्ष प्रश्न न सिर्फ शासन, प्रशासन, पुलिस, व्यापारी एवं आम जनमानस के लिए तब तक खड़ा रहेगा जब तक कोरोना के साथ-साथ पुलिस एवं प्रशासन का भय सच में लोगांे को नहीं होगा।

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