पत्रकार एवं नेताओं के ग्रुप पर शुरू हुआ नम्बरों का खेल

पत्रकार एवं नेताओं के ग्रुप पर शुरू हुआ नम्बरों का खेल

एसएसपी, कोतवाल सहित दर्जनों पुलिसकर्मी भी थे ग्रुप मेम्बर
जिला स्तरीय अधिकारियों के संज्ञान के बाद मचा हड़कम्प, नगर भर में जारी है चर्चाएं
डिबाई/बुलन्दशहर
। जुआ एवं सट्टा एक ऐसा सामाजिक कलंक है, जिससे धनोपार्जन तो सम्भव है, पंरतु जो धन इससे प्राप्त होता है वो निश्चित ही कलंकित होकर आता है। इसी के साथ प्राप्त करने वाले के दामन पर दाग लग जाता है। अतः कानून में इसे एक कलंकित एवं अपराधिक मामलों से जोड़ कर देखा जाता है। लेकिन यदि सट्टा बाजार सोशल मीडिया या व्हाट्सएप ग्रुपों में चल पड़े तो इसे कानून के मुंह पर तमाचा ही समझा जाएगा। ऐसा ही कुछ घटनाक्रम 18 जून को उस वक्त देखने को मिला, जब जिला बुलन्दशहर ग्रुप नामक एक व्हाट्सएप ग्रुप पर रात्रि लगभग 1.28 बजे एक मैसेज प्रेषित किया गया ,जिसमें कुछ संख्या अजीब ढंग से लिखी हुई थी। मामले ने उस वक्त तूल पकड़ लिया ,जब 18 जून की सुबह सट्टा बाजार में उसी नम्बर के खुलने की चर्चाएं दो चार होनी शुरू हो गयी, जिससे ये पुष्ट हो गया कि उक्त नम्बर का सीधा सम्बन्ध सट्टे से ही जुड़ा हुआ था।
गौरतलब है कि उक्त व्हाट्सएप ग्रुप में जोड़े गए सदस्यों की सहमति लिए बिना एडमिन ने न सिर्फ प्रमुख अखबारों के संवाददाताओं, पुलिस के जिलास्तरीय अधिकारी, डिबाई तहसील के कई अधिकारी एवं थाना प्रभारियों, आरक्षियों के अलावा नगर के प्रमुख सामाजिक एवं राजनैतिक लोगांे को उक्त ग्रुप में बतौर सदस्य शामिल कर रखा है। व्हाट्सएप ग्रुप पर हुई इस हरकत से न सिर्फ ग्रुप में जुड़े हुए समाजसेवी बल्कि पुलिस विभाग के लोग भी सकते में आ गए। जिसके बाद इस ग्रुप से लेफ्ट होने का ंिसलसिला चल पड़ा। इस घटना के बाद कई प्रश्नों ने सर उठाना शुरू कर दिया है। चर्चाएं तो यहां तक हैं कि आखिर कौन वो व्यक्ति है जिसने ये नम्बर ग्रुप में प्रेषित किये और क्यों? फिर इसी के साथ सवाल ये भी बनता है कि ये नम्बर उक्त ग्रुप में आखिर किसके लिए डाले गए थे? कही इस ग्रुप की आढ़ में सट्टा बाजार तो गुलजार नहीं किया जा रहा? कही ऐसा तो नहीं कि स्थानीय पुलिस की नाक के नीचे ही ये खेल खेला जा रहा हो और सभी मूक दर्शक बने बैठे हैं। क्योंकि इस प्रकरण में सीधा सा एक प्रश्न चिन्ह ये जरूर लगता है कि क्या पुलिस द्वारा इस मामले में कोई विधिक कार्यवाही निष्पादित की गई है? क्योंकि ये तो सत्य है कि जब भी पत्रकारिता धर्म का पालन करते हुए कोई पत्रकार समाजिक कुरीतियों को मुद्दा बना कर कोई समाचार प्रकाशित करता है तो उस पर आरोप लगाने का काम तत्काल कर दिया जाता है कि ये पत्रकार इस बुराई में सम्मिलित है। चाहे वो सट्टे के खिलाफ कोई खबर हो या दलालों के खिलाफ! पत्रकार ही ऐसे कलंकित सेवाओं में लिप्त माननीयों के निशाने पर आ जाता है। परन्तु कही ऐसा तो नहीं कि इस बार सिस्टम के चौथे स्तम्भ को बदनाम करने के लिए कोई देवदूत ऐसी ही सट्टे की बदनाम गलियों से ही आ गया हो? यानी इस सट्टे बाजार की रौनक अब पत्रकार जगत की जीनत बन गयी हो? क्योंकि यदि ऐसा है तो आगे आने वाला वक्त खास कर पुलिस के लिए खासा सर दर्द बनने जा रहा है। क्योंकि यदि डोली के लुटेरे ही डोली के खैरख्वाह होंगे तो? इस मुद्दे पर न सिर्फ सम्मानित स्थानीय पत्रकारों, सामाजिक एवं राजनैतिक लोगों में खासा रोष व्याप्त है। जहां तक सूत्रों की मानें तो इस मामले पर जिला स्तरीय अधिकारियों ने संज्ञान ले लिया है और इस मामले में विस्तार से जानकारियां जुटाई जा रही हैं। अब देखना है कि इस प्रकार के संवेदनशील मामलों में स्थानीय एवं जिला स्तरीय पुलिस प्रशासन क्या कार्यवाही करता है ? जिनसे पुलिस एवं प्रशासन पर सीधे सवाल खड़े होते हों।

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