दुष्परिणामों पे दूरदृष्टि डाल गांव को बचाना जरूरी

दुष्परिणामों पे दूरदृष्टि डाल गांव को बचाना जरूरी

बुलन्दशहर। कोरोना वायरस की पहली लहर से हमारे गांव 85 फीसदी तक सुरक्षित थे, परंतु कोरोना वायरस की दूसरी लहर ने आज गांवों को भी अपनी चपेटे मे ले लिया है, जिसके चलते गांव मे रह रहे दर्जनों नागरिक इलाज के अभाव मे निरंतर मोक्ष प्राप्त कर रहे हैं। ये हमारे देश के लिये बहुत ही चिंतनीय विषय है। हमारे देश के खेतीहर किसान जो हमारे अन्न प्रदत्त दाता हैं ,उनका एक बहुत बड़ा हिस्सा गांवों मे ही वास करता है। भारत देश के 85 प्रतिशत किसान जो अपनी खेती बाड़ी की जमीन से कुछ ही दूरी पर रहते ताकि वो समय पर अपने घर से खेती करने जा सकें। गांवों मे रह रहे लोगों मे निरंतर बढ़ते कोरोना वायरस के चलते हो रही मौंतो मे हो सकता है कि बहुत से ऐसे किसान हो जो देश के लोगों के लिये भूख मिटाने के लिये अन्न का उत्पादन करते हैं। यदि हमारे किसान भाईयों की आबादी का हिस्सा यूंही चिकित्सा के अभाव मे निरंतर समाप्त होता चला गया तो हमारे देश को आने वाले समय मंे और भी अधिक समस्याओं से जूंझना पड़ सकता है। किसानों के अभाव मे खेतीबाड़ी कौन करेगा? अन्न की उत्पत्ति कैसे हो पाऐगी ?ऐसी बहुत सी समस्या हैं ,जिनकी ओर दूर दृष्टि से सोच विचार करना बहुत जरूरी है, इसलिये हमारे गांवों मे भी चिकित्सा सुविधा मुहैया करवा कर एक बड़े पैमाने पर गांवों मे होने वाले मृत्यु दर को रोकने के लिये हर एक संभव प्रयास करना चाहिये। दूसरा खतरा ये भी है कि यदि किसान संक्रमण के चपेट मे यूंही आते जाऐंगे तो उनके द्वारा की जाने वाली खेती मे भी संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाएगा, जो पूरे देश के नागरिकों के लिये एक खतरे की घंटी है। इस खतरे की घंटी को भांपना और प्राथमिकता देना बहुत ही जरूरी है। आज अमीरी गरीबी किसी को न देख न भेद करते हुए बढ़ते इस महामारी को रोकने की आशा की किरण को जलाएं रखना बहुत ही जरूरी है, परंतु आने वाले समय मे किसानों, खेती और गांव मे बढ़ते संक्रमण के भविष्य मे होने वाले दुष्परिणामों मे दूरदृष्टि भी डालना बहुत ही जरूरी है

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