घोड़े व खच्चर में मिली ग्लैंण्डर्स बीमारी, इंसानों के लिये खतरा बढ़ा, प्रदेश के कई जिलों में हाई अलर्ट

घोड़े व खच्चर में मिली ग्लैंण्डर्स बीमारी, इंसानों के लिये खतरा बढ़ा, प्रदेश के कई जिलों में हाई अलर्ट

बुलन्दशहर समेत कई जिले से सात घोडे़, खच्चर व गधों की रिपोर्ट आई पॉजिटिव
बुलन्दशहर। घोड़ों में ग्लैंण्डर्स बीमारी की पुष्टि होने से घोड़ों संग इंसानों की जान का भी खतरा बढ़ गया है। पशु विभाग ने जहंा बरेली मंडल के सभी जिलों में अलर्ट जारी किया है, वहीं बुलन्दशहर के भी पशु विभाग ने अलर्ट जारी किया हैं। जिला बदायूं के उझानी और सदर पशु चिकित्सालय में घोड़े का सीरम पाॅजिटिव पाए जाने पर पशुपालन विभाग बरेली मंडल के एडीशनल डायरेक्टर डॉ0 जीएन सिंह ने सभी मुख्य पशु चिकित्साधिकारियों को जरूरी कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। वहीं जिला बुलन्दशहर में भी पशु विभाग के आला अधिकारियों ने लखावटी ब्लाॅक के ग्राम शेखपुर गढ़वा में एक घोड़े व खच्चर में सीरम पाॅजिटिव पाये जाने पर अलर्ट जारी किया है।पशु विभाग के आला अधिकारियों ने घोड़ा,गधा व खच्चर पालकों को सचेत रहने के निर्देश दिए हैं।
बदायूॅं के उझानी में घोड़ों में मिली ग्लैण्डर्स बीमारी
डॉ0 जीएन सिंह ने बताया कि जिला बदायूंॅ के उझानी पशु चिकित्सालय में चार और सदर पशु चिकित्सालय में एक घोड़े का सीरम सैंपल ग्लैंण्डर्स रोग के लिए पॉजिटिव पाया गया है। ग्लैंण्डर्स रोग केन्द्र सरकार द्वारा नोटिफाइएबल कैटेगरी (मानव व पशु ) में आता है। यह बल्कोलडेरिया बैक्टीरिया द्वारा होता है। यह जुनोटिक रोगों की श्रेणी में आता है। यह घोड़ों के अलावा अन्य स्तनधारी पशुओं और जनमानस में भी हो सकता है। चिकित्सक द्वारा बताया गया कि यह बीमारी एक संक्रमण के तौर पर फैलती है, जो खाल के घाव, नाक के म्युकोसल सर्फेस व सांस द्वारा हो सकता है।
इस बीमारी का पता कैसे लगाएं
इस बीमारी का पता एलाइजा और कॉम्लीमेंट फिक्सेशन (सीएफटी) टेस्ट के जरिए लगाया जा सकता है। एक्यूट फाॅर्म में घोड़ों में इस बीमारी में फेफड़ों में गांठें व श्वसन तंत्र की म्यूकस मैमरेन पर घाव पाए जाते हैं। इसमें पशु खांसी से ग्रसित होता है और नाक से स्राव निकलता है। उसके बाद सैप्टीसीमिया से मौत हो जाती है। क्रोनिक रूप में लिम्फ वैसल पर गांठें, जिसमें घाव बन जाते हैं और उसके बाद मौत हो जाती है।
किस-किस मानव में फैलती हैं यह बीमारी
घोड़ों से मनुष्यों में यह बीमारी आसानी से पहुंच जाती है, जो लोग घोड़ों की देखभाल करते हैं या फिर ईलाज करते हैं, उनको खाल, नाक, मुंह और सांस द्वारा संक्रमण हो जाता है। मनुष्यों में इस बीमारी से मांस पेशियों में दर्द, छाती में दर्द, मांसपेशियों की अकड़न, सिरदर्द और नाक से पानी निकलने लगता है।

घोड़ों में उत्पन्न इस बीमारी का नहीं कोई इलाज
जब भी यह बीमारी घोड़ों में हो जाती है, इसका ग्लैंण्डर्स फारसी एक्ट के तहत कोई ईलाज भारत में नहीं है। जांच में ग्लैंण्डर्स मिलने पर घोड़े का अंत दर्द रहित मृत्यु यानी यूथेनेसिया (इच्छा मृत्यू ) ही है। इसके बचाव के लिए अभी तक कोई टीका उपलब्ध नहीं है
बीमार घोड़े को दूर करना ही इसका इलाच
एडीशनल डायरेक्टर ने सभी पशु चिकित्सकों को निर्देश दिये हैं कि यदि किसी भी घोड़े में इस तरह के लक्षण पाए जाएं तो उसे आबादी से अलग बांधा जाए। उसके परिवहन पर रोक लगा दी जाए। संबंधित जगह का डिसइंफेक्शन कराया जाए और घोड़े का सैंपल लेकर मंडलीय चिकित्सालय के जरिए इसे हरियाणा के हिसार स्थित राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान संस्थान भेजा जाए।
घोड़,खच्चर व गधों के सैंपल लेने के निर्देश
डॉ0 जीएन सिंह ने सभी पशु चिकित्सकों को निर्देश दिए हैं कि यदि सैंपल पॉजिटिव पाये जाए तो केंद्र के पांच किलोमीटर क्षेत्र के समस्त घोड़ों का सैंपल लिया जाए। इसके अलावा 5 से 10किलोमीटर क्षेत्र के 50फीसदी घोडे़,खच्चर व गधों का सैंपल लेकर भेजा जाए। जिले में सैंपल पाॅजिटिव आएं तो इसका तुरंत पालन किया जाए। उन्होंने बताया कि जिला बदायूं के अलावा बरेली, पीलीभीत और शाहजहांपुर जिलों को निर्देश दिए हैं कि 20फीसदी घोड़ों आदि का सैंपल लेकर जांच के लिए भेजा जाए,जिससे कि इस बीमारी का किसी भी तरह से फैलाव न हो और यह बीमारी आगे चलकर भयावह न हो।

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