कोविड से हो रही मौतों के बाद भी चुनावों को महत्व, आम आदमी के प्रति नही है कोई जिम्मेदारी

कोविड से हो रही मौतों के बाद भी चुनावों को महत्व, आम आदमी के प्रति नही है कोई जिम्मेदारी

जनप्रतिनिधि हुए मूक दर्शक, संवेदनाएं रखी ताक पर
डिबाई/बुलन्दशहर ।
वर्तमान में कोविड कहर विगत वर्ष के संक्रमण से कितना अधिक प्रभावी है,इसका आंकलन कोविड के पहले चरण और वर्तमान में होने वाली मौतों से ही लग रहा है। एक्सपर्ट्स की मानें तो कोरोना का दूसरा फेज पहले की तुलना में कई गुना खतरनाक है। क्योंकि वर्तमान में कोरोना से ग्रसित रोगियों में युवाओं की बड़ी संख्या है, जिनमें ऑक्सीजन की कमी मौत की मुख्य वजह बनी हुई है। लेकिन दोनों ही लहरों में एक समानता है कि डिबाई विधानसभा से ऐतिहासिक जीत दर्ज करने वाली डॉक्टर की उपाधि से सुशोभित विधायक डॉ0 अनिता राजपूत कोरोना की विगत लहर में भी शांत एवं सौम्य बनी रहीं और ऐसा ही व्यवहार उनका वर्तमान में भी बना हुआ है अर्थात वो कोविड के प्रथम चरण में भी आम जनमानस के प्रति पूरी तरह उदासीन एवं लापरवाह बनी रही, वैसी ही वो आज भी है। अगर विगत वर्ष के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्पष्ट है कि जिस वक्त कोविड-19 का दौर शुरू हुआ, तब से लेकर और समूचे लॉकडाउन के दौरान जिला, तहसील, नगर एवं क्षेत्रीय प्रशासन के अलावा लोकल छोटे ,बड़े व्यापारी, धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों के अलावा सिविल डिफेंस ने जीतोड़ कर जन सेवा की। लेकिन जन प्रतिनिधि चुप्पी साधे अपने घरों एवं फ्लैटों में तब भी सुरक्षित बैठे रहे और आज भी जब कोरोना ने बहुत बड़ी संख्या में डिबाई विधानसभा क्षेत्र की जिंदगियों को अपने आगोश में ले लिया है ,तब भी जन प्रतिनिधि आंखों पर पट्टी बांध कर बैठे हैं। डिबाई क्षेत्र में स्वास्थ सम्बन्धी व्यवस्थाएं न तब पर्याप्त मात्रा में थी और न आज ही किसी का ध्यान डिबाई के स्वास्थ्य की ओर है। उनके लिए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की रणनीति बनाना आज सर्वोपरि है। जहां एक ओर बुलन्दशहर सदर से वर्तमान विधायक उषा सिरोही ने अपनी विधायक निधि से जिले में ऑक्सीजन आपूर्ति की व्यवस्था में 50लाख रुपये जिलाधिकारी को दिए हैं तो वही डिबाई विधायक द्वारा ऐसा करना तो दूर उनको तो ये आइडिया भी नहीं होगा कि अब तक डिबाई क्षेत्र में कोरोना के चलते कितनी जिंदगियां हमेशा के लिए खामोश हो गयी। जिसका सबसे प्रमुख कारण है डिबाई नगर से लगभग 50 किलोमीटर के अंदर एक भी ऐसा सब सेंटर या कोई ऐसा विकल्प नही है कि देर रात अथवा कोरोना से ग्रसित होने पर आपातकाल स्थिति में रोगी को फर्स्ट ऐड देकर उसकी जिंदगी बचाई जा सके, जबकि विगत कई वर्षों से मुंह बाए राह तकता डिबाई विधानसभा का वो चर्चित सफेद हाथी ,जो इस कोरोना काल मे डिबाई वासियों के लिए अत्यंत लाभकारी साबित हो सकता था यानी 100 बेड का वो अस्पताल ,जिसे उत्तर प्रदेश के तत्कालीन स्वास्थ मंत्री एवं वर्तमान एटा सांसद राजवीर सिंह द्वारा बतौर सौगात डिबाई को दिया गया था, जो लगभग साल, 2016 तक बनकर तैयार भी हो गया था। साथ ही वर्तमान जिलाधिकारी रविन्द्र कुमार द्वारा वर्ष 2020 में यह सोचकर इसका निरीक्षण भी किया गया था कि इसे शीघ्र सुचारू रूप से संचालित कराते हुए प्रयोग में लाया जाये। लेकिन जैसे-जैसे कोविड-19 के प्रथम चरण का उतार हुआ तो इसकी ओर से सभी का ध्यान हट गया। विगत चार साल में दर्जनों मार्गो का शिलान्यास करती डिबाई विधायक ने इस अस्पताल को कोविड के लिए प्रयोग हेतु बनाये जाने के लिए क्या प्रयास किये? ये अपने आप मे एक अहम सवाल है। जबकि इन सबसे इतर बुलन्दशहर की सदर सीट से विधायक उषा सिरोही ने माना कि जो निधि उनकी क्षेत्र की जनता के लिए ही काम में लायी जानी है तो उसका प्रयोग उनकी जिंदगियों को बचाने में क्यों न किया जाए? क्योंकि अगर जिंदगियां रहेंगी तभी क्षेत्र रहेगा। अगर देखा जाये तो बुलन्दशहर में बने अस्पतालों में केवल बुलन्दशहर के ही नहीं बल्कि वहां भर्ती होने वाला पीडि़त जिले के किसी भी कोने का हो सकता है। परन्तु अगर डिबाई विधानसभा की बात की जाए तो न तो विधायक अनिता राजपूत ने ही इस ओर ध्यान दिया और न अन्य नेताओं ने। अब जिस तरह से कोरोना से ग्रसित होने पर जितनी जिंदगियां काल का ग्रास बन रही हैं या आगे बनेंगी तो क्या उनकी जिम्मेदारी उन जन प्रतिनिधियों की नहीं होगी? जो अब भी मौन साधे त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों के समीकरणों को साधने में लगे हुए हैं, जबकि उनकी अपनी विधानसभा क्षेत्र में उनके अपने लोग लगातार जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं

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