कहां से शुरू करूं और कहां से अंत?

कोई जब छूटी हुई दास्तानों का सिरा मौसमों की आवाजाही में भटक गया हो कहीं। जिंदगी कायदों के राग अलापती है और बेतरतीबी से बाज नहीं आती।बच्चे गोद से उतरकर शहर की सड़कें नापने लगे हैं।तोतली बोलियों की जुबान पुख्ता भरे-पूरे निर्देशों में तबदील हो चुकी है तो फिर जिंदगी कैसे वैसी की वैसी रहे जनाब?
वाकई वजूद से जुड़े सवाल बदल गए हैं। व्यक्तिगत सवालों की जगह कहीं ज्यादा व्यावहारिक सवालों ने ले ली है। फ्रिक्शन और ग्रेविटी के बीच का रिश्ता क्या है? पार्ट्स ऑफ स्पीच कितने किस्म के होते हैं? मेरे बालों में अब इतनी ही सफेदी उतर आई है कि मैं उन्हें मेहंदी की लाल परतों के नीचे छुपाने की नाकाम कोशिश भी नहीं करती।इतना ही सुकून आ चला है भीतर कि जिस्म का फिजिक्स न दिन के चैन पर हावी होता है, न रातों की नींद उड़ाता है। पढ़ लिया बहुत।पढ़ लिया मर्सिया कि उम्र अब चेहरे पर अपने रंग दिखाने लगी है।आंखें कमजोर होती हों तो हों, नजर तो नहीं बदली न। उंगलियों पर शिकन पड़ती हो तो पड़े, मोहब्बत पर पकड़ तो ढीली नहीं हुई।दिन घट रहे हैं तो क्या हुआ? जिंदगी तो बढ़ रही है हर रोज।
सुकून है उम्मीद के आखिरी पुल पर ही सही, लेकिन बैठा है वो कहीं-महबूब।वक्त की डूबती-उतरती शामों को रोशन करता, हम आशिकों के सब्र का इम्तिहान लेता है वो। कई जिस्मों, कई जिंदगियों से होकर कई सूरतों में उसको ढूंढते हुए जो हर बार ये रूह मौत और जिंदगी के बीच की जो हजारों यात्राएं करती है, उसी के लिए करती है।इसलिए सुनो ओ इश्क में डूबे हुए एक मारी हुई मति के बदकिस्मत सरताज,जिससे मिलना प्यार से मिलना। उसके जिस्म को खुदा का ठौर समझना और अपने इश्क को सजदा।जिस दिन इतनी निरूस्वार्थ मोहब्बत तुममें आ जाएगी, उस दिन तुम चिंताआंे से आजाद हो जाओगे। उस एक दिन-बन जाओगे तुम इंसान।चलो फिर से झाड़ लें अपने जानमाज की धूल और सभी मेहराबों का मुंह मोड़ दें काबे की ओर। जमा कर लो मोमबत्तियां और रोशन कर डालो एक-एक गिरिजाघर को कि दिलों के अंधेरों को रोशन करने का कोई और रास्ता सूझता नहीं है। चलो न ढूंढे अपना कोई एक महबूब दरियादिल खुदा जो आसानी से हमें हमारे गुनाहों से निजात दिला सके।

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